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Tuesday, February 21, 2012

Tails of Low I.Q. - Book by Karan Virk (Sixth Pandav)


 


“Waaaaaaaaaaah (Wooooooooooow) Taj!” is a common quote said by most tourists while witnessing the beauty of Taj Mahal. There must be something in India that makes it the center of attention. Housing 28 states and 7 Union Territories, India is the most diverse country in the world. Every corner of this vibrant country contains a mixture of its share of architecture, regional culture, and crazy issues resulting in mind fracture. This book contains stories cooked with a ‘Desi – Tadka’, sprinkled with Indian Masala.
I have written many of these stories during my school days and hopefully will be wandering the streets of India in future. My earlier ‘Emotional’ Pichkaris (Holi Water Guns) failed to bring me success, while filmmakers like Anurag Kashyap & Sudhir Mishra easily achieve success by exploring the dark depths of human mind. So, I have turned to ‘Low I.Q.’ and started my journey from a new perspective. My pseudonym is “Sixth Pandav” because I relate to (& share my name) with Karan from mythological epic Mahabharata who was a rebel in true sense.

I would like to thank my family, friends, and mentors for their support. My teachers from Kirpal Sagar Academy, Teja Singh Kandhari School, Modern Senior Secondary School, for their teachings. Personal thanks to the online masterminds who helped me gain a vision by analyzing their visions of Comic Groups, Storywrite Website, Allpoetry Website, Blogger Groups etc.

A very special ‘Thank You’ to Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba) without whom this project would have had never been created. He has provided commendable support by helping and guiding me through every part of this ‘Indie’ experience!

- Ivanpreet Singh Virk (Karan Virk) “Sixth Pandav”



Tails of Low I.Q. (Flop Fiction) 

1.    Paperback 

Pothi


Dorrance


2.     Ebook

Smashwords 


Lulu


Pothi


Also available on I Proclaim, Cinnamon Teal Publisher & few other publishing channels.

Sunday, August 29, 2010

Seeds Of Anarchy

'रवाशोल का नाम सुना है?'

'नहीं!'

'शक्ल तो है ही, अकल  भी तेरी  बंगाली ही है...उसने एक जनरल और काउंसिलर के घर में बम विस्फोट किये थे!'

'आतंकवादी था?'

'फ्रांस का था, जैसे तू कलकत्ते का है. अनार्किस्ट था....'

'पेंट ख़तम हो गया!'

'लाल वाले से लिख. ८ साल का था जब उसने इस रास्ते पर चलना शुरू किया, ३२ तक पहुँचते ही इसी रास्ते पर उसे दफना दिया और ऊपर से मोनार्की की चादर चढ़ा दी!'

'इंजन शुरू करूँ?'

'पहले ये जो हाथों पर पेंट की मेहँदी लगायी है, उसे तो देखने दे. पांच डिब्बे लग गए पूरी दीवार भरने में...इसे पढ़ तो सही....'
                                      
 'इंटों के जंगल जब जलें पानी की राह पलट जाए,
  अब जा के आँखें खुलीं जब लहू से मुख को धोये!'


'ले, आ गए दोनों. पीछे बैठ...खाली थी?'

'एक हवलदार था, हाकी से मार कर बाहर लिटा दिया था!'

'पंखे में लटका आना था, वर्दी से झल्लों पर पड़ी धूल ही हटती...भगा इसे!'

भोर के अँधेरे में मोटरसायकलें शोर मचाती हुयी गुम हो गयीं. और पीछे उजाला देती आग की लपटें अपनी पकड़ पुलिस चौकी पर मज़बूत कर रही थीं.

पृथ्वी - इस गाँव की आबादी कितनी है? १८००. और इस देश की? रूस से भी जायदा पेड़ उगा रखे हैं यहाँ. ये पेड़ हवा नहीं देते, आदमी की बची - खुची हवा भी बाहर खींच लेते हैं. क्या दिया है इस देश ने तुम्हे?...डेमोक्रेसी से भरा प्रपंच...१ पार्टी बनायो, नोटों से उसका प्रचार करो, और फिर ५ साल तक उस कुर्सी पर जोंक की तरह बैठे रहो. प्रगृति का इतना बुरा हाल है की किसानों को खुद्खुशियाँ करनी पड़ रही हैं..विकास की राह में रोड़ा डाला पड़ा है इस डेमोक्रेसी ने. और, डेमोक्रेसी कहाँ है? जनता के पास? जनता की डोर तो सरकार के पास है..कठपुतलियों की तरह नचाते हैं इस डोर से. २८ स्टेट और ७ यूनियन टेरिटोरी बना रखी हैं. कल को ७ और जुड़ जायेंगीं, और उन राज्यों का थोड़ा प्रोमोशन करेंगे फिर उस में सारा कारागार बंद. किसी भी स्टेट को उठने नहीं देते ये लोग...उसे, तब तक रगड़ते रहो जब तक वो कश्मीर जितनी सुकड़ नहीं जाती. क्या लगता है 'खालिस्तान' क्यूँ बनाया जाना था?... इस सरकार की वजह से, इस सिस्टम की वजह से और इस पूरे देश की वजह से. मकारी की नींव पर खड़ा है ये सारा देश. क्या हम इस गाँव को भी दान कर देंगे? इस गाँव के साथ जुड़े हुए १५ कस्बों की भी क़ुरबानी दे देंगे? अब बस...सहने की भी एक हद होती है, अब तो बर्दाश्त की सारी हदें पार हो चुकी हैं...क्रांति की ये लपट इस गाँव से उठ कर पूरे देश को अपने आगोश में ले लेगी. और उसे हम शुरू करेंगे. उसे वो कंपनी शुरू करेगी जो गंदगी के जाल में फँस - फँस कर तंग आ चुकी है. ये लहर रुकनी नहीं चाहिए!

पंडाल में उपस्थित लोगों के मुखों पर मौत का सा सन्नाटा छा गया. दो पल की ये ख़ामोशी आक्रोश से भरे ललकारों में तब्दील हो गयी.

संजय - संजीव, वो आ गए!

संजय और संजीव के नन्हे कदम पथरीली राह पर सरपट दौड़ते उन मोटरसायकलों का पीछा करने लगे जिन पर सवार युवकों के चेहरे ख़ुशी से चमक रहे थे.

आदिल - लो संजय, संजीव तुम दोनों के लिए शहर से कंचे लाया हुआ हूँ.

अधिकांश - अब गिल्ली छोड़ कर इस से लोगों की आँखें फोड़ना!

विनीत - जिसकी पहले से ही फूटी हुयी है, वो भी आ गया.

आज़ाद - पृथ्वी बुला रहे हैं तुम दोनों को.

अधिकांश और आदिल, पृथ्वी के घर की तरफ चले गए.

शुकला - आज़ादी मिल गयी तुझे?

आज़ाद - अभी तो इस गाँव को नहीं मिली...तो मुझे क्या तू लाठी पर लटका के देगा?

विनीत - नील आ रहा है!

शुकला - क्या हाल है?...कुछ नया लिखा?

नील - सुनो! गुजरात के किनारे हग रहा था जब नरमदा फट गयी. डेम की दीवार से मैं लटका, नीचे मेरी चड्डी उधड़ गयी.

विनीत, शुकला, और आज़ाद के ठहाके गूंज उठे. क्रूरता की मुस्कान तो पृथ्वी के चेहरे पर भी टिकी हुयी थी.

पृथ्वी - अन्दर कौन गया था?

आदिल - जी, वो दोनों!

पृथ्वी - आग किसने लगायी थी?

अधिकांश - विनीत और शुकला ने ही लगायी थी!

पृथ्वी - और तुम दोनों वहां पे मुजरा देख रहे थे. ये घड़ी देख रहे हो..

दीवार पर टंगी घड़ी के ऊपर धूल के टिले और जालों के पहाड़ बने हुए थे, फिर भी किसी तरह घड़ी की सुई हिल रही थी.

पृथ्वी - मेरे दादा की थी. अपनी बीवी से भी ज़यादा प्यार करता था इस से. और अब, वक़्त की धूल से पुती हुयी वहीँ टंगी पड़ी है. पर अब वक़्त की सुई बदलने का समय आ गया है. ये 'अन.र.की को' जो हमारे लिए कर रही है ना, उस से ये वक़्त गुज़र जाएगा. हमे मौका मिलेगा नया वक़्त खरीदने का....अधिकांश, कल तू इसे ले कर उनके दफ्तर जाएगा. वो जो बताएं उसे दिमाग में बिठा लेना. शाम तक लौट आना. रात को समारोह होना है!

अन.र.की. को, का दफ्तर देहातियों से भरा पड़ा था.

'प्रताप केंट से आये हो?'

आदिल - जी.

'लाइन लम्बी है. आधा घंटा रुको!'

अधिकांश - पृथ्वी भ्राता ने भेजा है.

'नुकुल इन्हें अन्दर ले कर जा!'

आदिल - क्या हम आज़ादी की आड़ में सेपरेटिस्ट मूवमेंट नहीं बना रहे?

अधिकांश - अगर, पांडव और कौरव साथ - साथ चिपके रहते न तो महाभारत होती ही नहीं. तुझे क्या लगता है पृथ्वी इस कंपनी का पार्टनर बनने के लिए उन्हें फंड कर रहा है. वो, ये पैसे हमारे गाँव और आस - पास के जो इलाके बना रखे हैं न, उन पर खर्च करने के लिए इधर दे रहा है. अकेले रहेगा तो टैक्स देते हुए रगड़ा जाएगा, और ये सरकारी भांड अपनी कमीज़ बदल लेंगे पर टैक्स नहीं हटायेंगे.

आदिल - पर, ये सब हम शांति से भी तो कर सकते हैं.

अधिकांश - साले, तू चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेता! एक धोती भी ले ले, और फिर गले में चरखा बांध के फैला शांति यहाँ. जो, कोई भूख - नंगा दिखे उसके लिए वही पर सूत की दुकान खोल देना. तेरे कॉलेज में काफी मिल जायेंगे, अहिंसक. उन से जा के सीख ले....अब चुप रह.

आदिल कुछ बोल पाता उस से पहले ही रिशिध सिंह केबिन के अन्दर आ गया.

आदिल - नमस्ते.

रिशिध - बैठे रह...पैसे ले आये हो?

अधिकांश - गिन लेना.

पैसों का बंडल टेबल पर गिरते ही रिशिध के हाथों में चला गया.

रिशिध - पृथ्वी से कहो की महिला प्रचार जायदा जोर पकड़ रहा है. अगले हफ्ते जिस जगह पर किसानों ने बैठना था, उस जगह पर वो अपना कैंप खोलना चाहती हैं.

अधिकांश - उन्हें हटाना तो आपका काम है.

रिशिध - झंडे हर कोई उठा सकता है, बस उन में रंग का फर्क होता है. लड़ाई हमारी, शस्त्र तुम्हारे, और विजय तो शस्त्रों से ही होती है.

अधिकांश और आदिल मोटरसाइकिल पर सवार गाँव के काफी नज़दीक पहुँच चुके थे.

आदिल - इस, कंपनी को फंड तो हम ही कर रहे हैं न. फिर ये कंपनी क्या कर रही है?

अधिकांश - ब्युराक्रसी तोड़ कर अनार्की फ़ैलाने की कोशिश कर रही है.

समारोह शुरू हो चूका था. हारमोनियम और तबलों की ताल के साथ नील की आवाज़ गूंज रही थी.




नील:


खेतों और खलिहानों में, मेरे मिट्टी के पहलवानों में,
देखो जर्जर अकाल पड़ा वो चमकते पकवानों में.
देखो यहाँ आके दिनकर,
दफना दिया इन्होने जनतंत्र,
फावड़े और हल को तोड़कर,
अनार्की को माने गणतंत्र!


पत्थर के रहते थे जहाँ गूंजते जयकारे,
मंदिर में भी पड़ने लगे अब अफीम के लश्कारे,
डेमोक्रेसी का नाद बजे,
कवि और लेखक कब के हारे!


जिस नारी के हाथ सहते थे चूल्हों का ताप,
मनमोहन को तू भूलकर, सोनिया के शब्दों को नाप.
रामधारी सिंह दिनकर तू भी देख गगन से,
सांप भी आजकल निकलते हैं खदर पहन के,
भ्रष्टाचार की सेल लगी रे,
पाप भी ना धोये जाएँ गंगा नहा के!


करन ही था उस युग का सबसे बड़ा दानी,
आकाश में धुंए का गुबार उठता है,
दूषित कर दिया मेरा पानी.
हवा पर भी टैक्स लगा,
मदारी का बंदर फिर भी ना जगा,
नीलाम हो गए दो गज़ ज़मीन के भी टुकड़े,
बजट से दूर भागता हर अभागा!


पहन लो तुम जितने भी मुकुट, टांग लो हीरे का गहना,
कण - कण में बिखेर दूंगा जब कुदाल चलाता आयूंगा,
मिट्टी से जो उत्पन हुआ उसी में है उसने बह जाना.
कलम से लिखने वालों की तरह है मेरी सोच,
अभी मुझे बहुत है उड़ना,
मेरी उड़ान को मत रोक!



पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा. और इधर पृथ्वी के घर में शिकन की हवाएं मंडरा रहीं थीं.

पृथ्वी - देख क्या रहे हो बे? जगह खाली करवायो, लीस पर थोड़ी ले रखी है उन्होने.

आदिल - मैं, कल नहीं आ सकूँगा. वो मुझे अपने भांजे को लेकर मोसक जाना है.

आज़ाद - सीधे - सीधे मस्जिद नहीं बोल सकता.

पृथ्वी - ठीक है. इसकी जगह मैं चलता हूँ. जीप तैयार रखना.

दोपहर की धूप जीप पर ताज बन कर सजी हुयी थी. जबकि, पृथ्वी, आज़ाद, अधिकांश, विनीत, और शुकला एक किला फ़तेह करने की तैयारी में थे.

मधु - देखिये, हमारा ग्रुप आज की औरत की आवाज़ है. घर पर आटे को गुंथती और परुषों के अत्याचार के नीचे पिस रही, इन औरतों के बारे में तो कोई नहीं सोचता. अब बात हक़ की और अधिकारों पर आ चुकी है. नारी से बंधी ज़ंजीर तोड़ने का वक़्त आ गया है.

पृथ्वी - ज़ंजीर तो रेड लाइट एरिया में बने हुए कोठों वालियों पर भी लगी हुयी है. उन्हें तो आप कभी नहीं खोलती. उनके अधिकारों की बात आते ही मुद्दा बदल जाता है, हक़ तहकाने में बंद कर दिए जाते हैं. उनके लिए लड़कर हाथ गंदे क्यूँ करें. अब उस जगह पर हमने किसानों और सोसाइटी के नीचे दबे हुए गरीबों की आवाज़ को उठाना है. आप कोई और जगह चुनिए. पैसे, हम दे देंगे.

माहोल मुर्दे की भांति शांत हो गया. एक पल के बाद उसी शांति को मधु की कर्कश आवाज़ ने तोड़ा.

मधु - देखिये, हम इस दिन का काफी देर से इंतज़ार कर रहे हैं. चुनाव सिर पर हैं, सड़कों पर काफी रैलियां होंगी, और यही मौका है हमे अपना सन्देश फ़ैलाने का. और, पैसों की आप फिकर मत करें. कोई तो हमे फंड कर ही देगा. आप लोग कोई और जगह क्यूँ नहीं चुन लेते? ऐसे काफी मैदान होंगे जहाँ से मंत्री और उनकी पार्टियाँ आपको देख सकें.

जीप से गाँव पलटे लोगों के चेहरे गुस्से में फुंकारते हुए थे. शायद सूरज भी इस गुस्से के कोप को सह नहीं सका और छिप गया.

पृथ्वी - इस धरने से लोगों को हमारे बारे में पता लगना था. हमारी जंग का हिसा बनते वो. अगर, उस कंपनी को फ़ैलाने के लिए पब्लिक ही नहीं मिलेगी तो क्या अनार्की को पेड़ से तोड़कर यहाँ बाटूँ. बुत बुने फिरते रहते हो तुम सब. १९९१ से ले कर २००६ तक सोमालिया भी सरकारी पंजों से आज़ाद था. और हर आज़ादी की कीमत लगती है. देख क्या रहे हो बे, पता लगायो कि नारी आंदोलन चल किसके पहिये पर रही है.


आज़ाद - कोई बिल्डर है. दुबई से आया है. अपने गाँव के साथ जुड़े हुए कस्बों को हटाना चाहता है. परमिट मिल चुका है उसे.

पृथ्वी की आँखों में खून उतर आया.

पृथ्वी - ये मेरी ज़मीन है, मेरे पुरखों का अंग है. यहाँ सोने की ईमारत बनाने से पहले फाड़ के गाद दूंगा उसको.......आदिल कहाँ है? बुला के ला उसे.

विनीत - शहर, उसके घर फ़ोन किया था, उसके भांजे ने उठाया था. बोल रहा था की, मामू मोस्को गया है. असल में उसका चाचा अपने शहर से चुनाव लड़ रहा है. उसी का प्रचार कर रहा है.

इस से पहले की कोई और कुछ बोल पाता, अँधेरे को चीरती हुयी एक रौशनी वहां आ पहुंची. रौशनी स्कूटर की थी.

पृथ्वी - मोस्को से कब आया तू?

आदिल - वो मैं...वो.

पृथ्वी - प्लेन ने बहरा कर दिया है. कहाँ था?

आदिल - वो मैं वोट डालने गया था.

पृथ्वी - किसको? अपने बाप को...और झूठ बोला ना तो यहीं टांग दूंगा.....आज़ाद, शर्ट उतार इसकी.

अधिकांश - इस पर हम...

आज़ाद - तू चुप रह.

पृथ्वी - आग लगा इसे.

आज़ाद की जेब से माचिस की तिल्ली निकल कर और जल कर आदिल की शर्ट से चिपक गयी.

पृथ्वी - स्कूटर जला दे.

आदिल बस अपने स्कूटर की जलती चिता को देखता रहा.

पृथ्वी - अगली बार तेरा अंतिम संस्कार भी कर देंगे.

पृथ्वी के जाने के बाद, स्कूटर में लगी आग की लपटें और फैलने लगीं.

आज़ाद - विनीत, शुकला पानी डालो स्कूटर पर. खड़ा - खड़ा ही फट ना जाए....... आदिल, देख समझने  की कोशिश कर वो जो बोलता है उसे सुन लिया कर. नहीं तो तुझे काटेगा यहाँ, और टुकड़े हरयाने में मिलेंगे. और तेरे पिता तो कलकत्ते ही रहते हैं ना. दरी बेचते हैं ना वहां पे. तो उनका तो खर्चा और बढ़ेगा. एक समय ख़राब, और बेटे की लाश उठाने के लिए दरी ख़राब. अधिकांश, पानी पिला इसे.

दोपहर की गर्मी में बरगद के पेड़ के नीचे काफी शोर उत्पन हो रहा था.

शुकला - जाल बिछा चुका हूँ.

अधिकांश - दाहिने वाली काट.

विनीत - फँस गया जाल में.

आज़ाद - ले तीन ले गया.

अधिकांश - सल्फेट, जाल खुद के लिए बिछा रहा था!

पृथ्वी - शतरंज चल रही है.

आज़ाद - चेकर्स है पृथ्वी सा. शहर में नया आया है. लड़के सुबह ही ले के आये हैं.

पृथ्वी - कैसे खेलते हैं?

आज़ाद - १२ गीटियाँ दोनों खिलाड़ियों को मिलती हैं. शतरंज के जैसे सफ़ेद और काले खाने बने हुए हैं. सफ़ेद वाले को काली गोलियां खानी हैं और काले को सफ़ेद. १ ही बारी में ३ से लेकर ४ गीटियाँ जीत सकते हैं. बस चाल चलनी पड़ती है.

पृथ्वी के दिमाग में चाल बुनने लगी.

पृथ्वी - आज़ाद! जीप निकाल. विनीत, तू चल मेरे साथ.

जीप के तैयार होते ही पृथ्वी और विनीत उस में सवार हो गए.

पृथ्वी - आज़ाद, तू धरने की तयारी कर. हम आते हैं.

गाँव की कच्ची पगडण्डी से शहर की पक्की सड़कों पर सरपट दौड़ती जीप, विदेश से आये बिल्डर के घर के सामने रुक गयी.

पृथ्वी - जानता है ना यहाँ हम क्यूँ आये हैं. वक़्त आ गया है.

पृथ्वी ने विनीत के हाथ में बंदूक थमा दी. विनीत के कदम दरवाज़े के सामने रुके और उसके हाथ घंटी बजा कर.

'क्या चाहिए?'

विनीत - जी मैं जनराज कॉलेज से आया हूँ. हम लोग गरीबों के उद्वार के लिए धन राशी जमा कर रहे हैं. आप कुछ जोड़ना चाहेंगे.

'जीरो!'

इस से पहले दरवाज़ा बंद होता बंदूक की नाल की बिल्डर की नाक पर मजबूत प्रहार हुआ. और बिल्डर ठिठक गया.

विनीत - हमारी अनार्की बंद कराएगा हरामी...सोने का बाज़ार बनाएगा यहाँ तू.
लगातार हो रहे बंदूक की चोटों से बेहाल बिल्डर का शरीर फर्श पर गिर गया. विनीत रुक गया. बिल्डर रगड़ते हुए अपने विदेशी कालीन के ऊपर पहुँच गया.

विनीत - चल तेरे को शांति तो मिलेगी.

आवाज़ के धमाके हुए और बंदूक से तीन गोलियां निकाल कर बिल्डर के घमंडी शरीर में घुस गयीं. मखमली कालीन पर गुलाल पुत गया.

पृथ्वी - कितनी गोलियां चलायीं?

विनीत - ३!

पृथ्वी - ४ डाल आनी थीं. चल.

धरने का दिन आ गया. पृथ्वी अपने फ़ोन के आस - पास ही चहलकदमी करे जा रहा था. फ़ोन बजा.

आज़ाद - हाँ, भाई सा. यहाँ सब कुछ बढ़िया चल रहा है. वो महिला विभाग भी नहीं आया.

पृथ्वी - ध्यान रहे इस जंग का एलान और संदेश हर घर तक पहुँचाना चाहिए.

आज़ाद - आप फिकर मत कीजिये. संभाला हुआ है मैंने यहाँ सारा कुछ.

रात के अँधेरे को चीरती रोशनियाँ पृथ्वी के घर से आ रहीं थीं. घर नयी नवेली दुल्हन की तरह सजा हुआ था. ये जीत की चमक थी. ये अनार्की का जशन था.

सुबह हुयी पर ये सुबह मनहूसियत की किरण फैला रही थी.

आज़ाद - गज़ब हो गया पृथ्वी भाई सा. दरवाज़ा खोलिए.

शुकला - भाई सा!

पृथ्वी - क्यूँ चिल्ला रहा है?

आज़ाद - कंपनी पर इनकम टैक्स वालों का छापा पड़ गया. काफी काला धन बरामद हुआ. क्लर्कों की तो ज़मानत हो गयी. रिशिध का कुछ पता नहीं चल रहा. कंपनी बंद कर रहे हैं.

पृथ्वी का शरीर जड़ होकर ज़मीन पर आ गिरा. पृथ्वी की स्थति को नील के शब्द ऐसे बयान कर देते.

"ताकत और अहंकार को ना काट सकी दया ,
वो आखिरी बाण दुशासन के प्राण हर ले गया!"


आज़ाद - इन्हें, दिल का दौरा पड़ा है....अधिकांश, जीप निकाल..विनीत पानी ला.

गाँव के खेतों की कच्ची पगडण्डी के किनारे संजय और संजीव मिट्टी खोद रहे थे.

संजय - हमारे गाँव में इतने सारे पेड़ हैं. फिर हम एक और क्यूँ उगा रहे हैं?

संजीव - अभी पेड़ उगा कहाँ है! बीज डाले हैं.

संजय - ये पेड़ राहगीरों को छाया भी देगा.

संजीव - पेड़ तो उगने दे. ऐसे ही बीजों को यहाँ कतार में मिट्टी खोद - खोद डालते जायेंगे और गाँव में और हरियाली ला देंगे.

संजय - ये बीज गुस्सा तो नहीं होंगे.

संजीव - काफी सहा है इन्होने. थोड़ा सा और बर्दाश्त कर लेंगे.

संजय - ये बीज, पेड़ बन कर क्या देंगे?

संजीव - सब कुछ देंगे!

Tuesday, August 17, 2010

Politician

"Aise hone chahiye, humare desh ke Politician."

Us, kacchi sadak par bichi woh keelien, us Safed Mercedes ka intezar karte lag rahin thin. Mercedes ki backseat par baithe us shakhs ka dhyaan kahin aur hi tha. Gaadi ke Driver ko bhi dhyaan na raha ki kab, gaadi keelon ke upar se guzar gayi....Aur, gaadi ki hawa tayron se.

Driver - Sahib, lagta hai Tyre Puncture ho gaya hai!

Mercedes se neeche utre us shakhs ki aankhon mein nafrat thi. Apni, chappal par lage keechad ko dekh kar, chehre par ghinn thi. Ghamand se bhari awaz mein usne apne, Driver ko apne paas bulaya.

'E, mere jute saaf kar!'

Driver - Jee, aaya Sahib.

Yeh, sab manzar do aur aankhein dekh rahin thin. Yeh aankhein, Mercedes ki side par hi bane ek, Auto Repair Shop mein khade 12 - 13 saal ke yuvak ki thin. Shayad, yeh Auto Repair Shop issi yuvak ki thi. Bahut der se dekh rahe yuvak ke sabr ka bandh toot gaya aur woh dauda huya Mercedes ke saamne pahuncha.

Hiten - Saab, maine dekha aapki gaadi kharab hote huye..Yeh, choti si Auto Repair Shop meri hi hai. Mujhe, 15 minute dijiye, aapki gaadi ka tyre change kar dunga.

Us, aadmi ne munh se kuch nahi bola. Bas, uski gardan ne ishara kar diya. Shayad, woh aadmi kisi soch mein doob gaya tha.

Mumbai ki mayanagri, Bollywood. Successful actor, Prashant Sinha ki nayi Picture ka Premiere........Anekon sitaron se saji mehfil mein, sab nazrein, Prashant Sinha par thin. Press waalon ki saawal ki list, Carpet se bhi lambi thi. Prashant Sinha, Reporters ke saawalon ke jawab de hi rahe the ki, ek Jeep aa ker ruki. 15 - 20 ladke neeche utre.

'Aap log andar nahi jaa sakte.'

Security Guard itna hi keh paya kyunki uske baad, uski jubaan zameen chatne mein lag gayi.....Ladkon mein se ek bhaari awaz aayi.

'Bottle, phod saale ke!'

Prashant Sinha ke sir par zor se ek bottle padi..Prashant kuch kar paata us se pehle hi ladkon dwara laayi gayi hockey sticks ki chot se uski taang ki haddi jawab de chuki thi. Prashant Sinha par, Hockey Sticks dwara kiye gaye ghaav badhne lage...Kisi ne kuch kehne ki koshish nahi ki. Sab, log murti ban tamasha dekhte rahe.

10 minute baad, Hockey ki maar band huyi. Ek, ladke ne apna Mobile, Prashant Sinha ke kaan ke pas lagaya. Ek, awaz aayi.

'Tujhe yahan tikne nahi dunga.......Abhi toh Haddi todi hai, agli baar mere upar Picture banane ki koshish ki toh, teri chamdi Acid se jala kar tere Camere par latka dunga......Jai Maharashtra!'

Ladkon ki toli, 'Jai Maharashtra' ke naare lagate huye, Jeep mein sawar hokar andhere mein ghum ho gayi. Zakhmon se karah rahe, Prashant Sinha ke upar koi dhyaan nahi de raha tha.

Agle din wohi Jeep ek Theatre ke bahar aa kar ruki, jahan par shayad kisi Bhojpuri Picture ka Show chal raha tha.

'Band karo yeh ashleel tamasha........Phaad Do Seatein....Laga do aag iss Bhojpuri Lanka mein!'

Picture dekh rahe log, darwazon ki taraf bhagne lage. Kaiyon ne Balcony se chalaang laga di...Theatre ka mallik dauda huya aaya.

'Yeh, aap log kya.....................

Uski, baat band hoti us se pehle hi ek ladke ne uske munh par Sticker laga diya.

'Mera naam, Narayan hai.....Aur, kaan se yeh bali nikal kar sun le, aaj ke baad yahan koi Picture nahi chalegi....Chali toh, tere saare patthe, teri laash ka Show dekh rahe honge.....Kamal, Shirt phaad iski.'

Cinema Owner ki shirt ke kai chithde ho gaye. Ladkon ne woh Shirt sulga di.

Narayan - Bana do yahan shamshan.

Jalti Shirt ke tukde, Seaton ki taraf phenk diye gaye...Kuch, ladkon ne Cinema ke Parde ko aag laga di. Cinema ke mallik ke kuch kar paane se pehle hi ek Hockey ki parhar se uske hosh ud gaye......Cinema Hall ko jalti chita bana kar ladkon ki toli nikal chuki thi.

Narayan - ......Haan, Saab....Jee, tod dete hain....Mitti mein mila denge....Aap, phikar na karein......Shankar, Jeep, Theke ki taraf mod.

Sharab ke addon par bhaari bheed lagi huyi thi. Jeep aa chuki thi..Lekin iss baar ladkon ke haath mein Hockey nahi thi....Talwaron ki chamak thi...Is se pehle hi koi kuch samajh paata, ladkon ki toli ne logon ki chamdi utarni shuru kar di.

Narayan - Bolo......Jai Maharashtra!

Shaarab ki botlein choodiyon saman zameen par gir - gir tootne lagin...Bheed kum ho chuki thi...Narayan ka rukh, sharaab bech rahe aadmi ki taraf tha.

Narayan - Tune hi likha hai kya, 'We Sell English Wine'?

'Jee!'

Uski, awaz aane ki hi der thi ki, Acid ki bauchar uske munh par pad chuki thi...Ashanaey dard le kar woh aadmi daudta huya, behosh ho gaya.

Narayan - Yahan ka har baccha - baccha, Desi Daaru peeta hai....Tujhe, badi angrezi chadi hai...Ab, bol Jai Maharashtra!

Kamal - Narayan, woh dekh shayad woh ladka issi ka beta hai.

Narayan ne bacche ko utha, Counter par bitha diya.

Narayan - Kaala Rang laayo.

Kuch ladke, phataphat Paint ka ek kanastar utha laaye. Narayan ne apna haath Rang mein dubo kar, bacche ke munh par mal diya.

Narayan - Ab, isse kabhi buri nazar nahi lagegi....Chocolate khaa!

Narayan ne ek Sticker uske munh par bhi chipka diya.

Jeep, wahan se nikal gayi. Bheed ka jama hona shuru ho gaya tha....Jeep, ek Taxi ke paas jaa kar ruki...Taxi khaali padi thi. Shayad, Taxi walah kahin gaya huya tha.

Narayan - Machis De!

Machis sulga kar, Petrol ki tanki mein daal di....Taxi, ekdum dhamake se phat gayi.

Narayan - Mumbai ki taraf rukh bhi kiya toh jaan kheench lenge....Jai Maharashtra!

Agle, din ke akhbaron ki khabarein badi surkh thin!

'An Actor Got Brutally Beaten Up.'

'A Cinema House And Its Owner Were Burned By A Group Of Teenagers!'

'Taxi Union Ke Ek Member Ki Taxi Ko Bomb Ka Gola Bana Diya Gaya. Hamalawar Farar!'

'A Man And His 5 Year Old Son, Beaten By Young Adult Attackers At Liquor Stores.'

'Was The Mumbai Police Sleeping?'


'Saab!'

Us, aadmi ka dhyaan khayalon se bahar aaya.

'Hun......Haan..!'

Hiten - Aapki, gadi ka tyre badal diya hai.

Gardan hila kar woh aadmi apni, Mercedes ki Back Seat par sawar ho gaya....Jaise, hi Mercedes chalne lagi, piche se Hiten ka haath gaadi ke sheeshe par aa kar laga...

Hiten - Saab.....Mera mehanatana toh dete jaayo.

Mercedes ruki aur Reverse hokar ussi jagah par aa ruki jis par woh khadi thi....Aadmi aur uska Driver dono bahar nikle.

'Kya Bola? Jaanta hai tu kis se paise maang raha hai?............Dev Jaykar naam hai mera......Saale, tera hone waala Leader hun.'

Dev Jaykar ki thokar se Hiten door ja gira.

Dev - Yeh, itna bada - bada Angrezi mein kya likha hai.....Apni dukaan ka naam, Shudh Hindi mein nahi likh sakta tha?....Tujhe toh iss desh mein rehne ka koi adhikar nahi hai....Rehta kidhar hai tu.

Chot ke prabhav se, Hiten ki aankhein nam hone lagin thin..Phir, bhi woh himmat kar bola!

Hiten - Woh, Hanuman Mandir ke paas waali basti mein...Yahan se thodi hi door hai.

Driver - Sahib, wahan toh Bihari rehte hain!

Dev ki aankhon mein khoon utar gaya.

Dev - Tu.........Tu mere jute saaf karega.....Dukaan chalayega yahan apni......Teri poori basti ko aag laga dunga main......Tujh se pehle teri hi jaise, Vidyarthiyon ki haddiyan tod chuka hun....Bol, Jai Maharashtra...Saanp das gaya hai kya?......Bol......Driver, iski dukaan tod do.

Hiten - Saab....Mujhe maaf kar do.....Saab...Aisa mat karo...Mere, Bhai ko Polio hai.... Uska jimma mere sir hi hai....Koi roko...Koi...

Hiten ki nazar, paas mein hi ek, Rehdi par, Pav - Bhaaji khaa rahe do Hawaldaron par gayi. Woh, dauda huya unke paas gaya.

Hiten - Daroga Saab, meri dukaan bacha lo.

Patil - Tune, kuch suna Pandya?

Pandya - Nahi toh....Kaan mein mail bahut jam gayi hai!

Patil - Beta, woh dukaan nahi hai...Sirf, ek gatte ka ghar hai...Toot jaayega toh behtar hai..Tera kya jaata hai?...Le, tu bhi khaa!

Hiten dauda huya apni dukaan par jaa pahuncha joki ab kabad ke roop mein wahan bikhar chuki thi.

Dev - Teri dukaan mein apna chunav chinh laga diya hai....Mat dena mat bhooliyo....Nahi toh agli baar tere Polio waale bhai ki laash yahan taang denge.....JAI MAHARASHTRA!

Mercedes jaa chuki thi......Peeche chut gayi thi cheekhein...Ansu...Nirasha....aur Dard.

Ek Chote Actor Ki Maut

Sundarlal Sharma Auditorium aaj darshakon se bhara huya tha.

'Goodmorning Sir. Me and my friends are from Blossoms Middle School. We are selling, Chocolates to raise donations for, 'Starve Hunger' Camp at our school. Would you like to buy one?'

Joy - No!

Darwaza bacchon ke munh par band ho gaya.

Shammi - Saala, jo Angrezi ka ratta chadya tha...Kisi kaam ka nahi..Sukhi, agli baar tu hi boliyo.

Sukhi - Munh par darwaza maara hai. Jee, toh karta hai iski chamdi utar kar, iski haddiyon ka Exhibition, Biology Class mein karun........Aye, woh dekh yeh kutta iske Garden mein bandha huya hai....Naresh, patthar le kar aa.

Ek dardnak cheekh gunzi. Joy ka garden, laal ho gaya. Joy, bhaaga huya aaya. Bacche jaa chuke the. Apne, kutte ki laash ko baahon le kar rone laga.

Joy - Kabhi - Kabhi, sabse kamzor....Sabse gehra ghaw de jaate hain.


Poora Auditorium taaliyon se gunz utha. Phoolon ki kalmein, hawa mein tairti huyi, Joy ka Role kar rahe Ashok ke pairon mein girne lagin. Parda band ho gaya.

Vishwa - Mr. Mittal, he is an fantastic actor.

Mittal - I know, Mr. Vishwa....I know.

Backstage, mauhal abhi shaant tha. Bawanda ke aane se pehle ki shaanti hawa mein thi.

Abhimanyu - Chaa, gaya kaminey......Chaa gaya...Kya, Performance di!

Parde ke peeche chal rahi iss tareef ke saath ab bahut kuch hone waale tha. Armani ke suit ki chamak ne Ashok, Abhimanyu,Uday ko chaunka sa diya.

Mittal - Well Done Mr. Ashok. What an exceptional play! I am Narayan Mittal and this is J.K. Vishwa. We are from M&V Industries......Let me not waste mine and your time....I want to buy this auditorium.

Ashok ko kaato toh khoon nahi.

Ashok - Jee, Yeh mere Pitaji ki yaad mein.......

Vishwa - Ghar aayi Lakshmi ko nahi thukarate...Yeh joote jaante hain kitne ke hain? Pachas Hazar, Made In China....Real Snake Skin..Saanp ki chamdi utar kar banaye hain. Bas, tumhe yeh Auditorium bechna hai, phir dekho saanp jaisi hari chamdi waale noton mein soyoge.

Mittal - We will....Infact I will make you an actor in Bollywood. Think about all the fame, money, power, stardom. People dream of it, You will experience it. Just sign this Contract. You are just one signature away from Heaven.

Ashok maano putle ke saaman wahan khada huya tha. Munh se kuch bol nahi nikal rahe the. Par, uske doston ko jubaan ko abhi tala nahi laga tha.

Abhimanyu - Iss, Auditorium ke saath toh Jhuggi waale rehte hain.

Vishwa - Tod denge.

Ashok ki aankhon mein khoon utar aaya. Uske kaampte haathon ne Contract uthaya aur do bhaagon mein vibhajit kar diya.

Ashok - Auditorium....Baba ki aakhiri nishani thi.

Mittal ke kadam darwaze ki taraf chal pade.

Vishwa - Apni, Photo par haar taangne ki taiyari kar le.

Uday - Woh, nahi maanega.

Abhimanyu - Bulldozer pakka aayega.

Ashok - Humme, Morcha uthana hoga.

Jhuggi - Basti waalon ke saath mil kar, Ashok aur uske doston ke kadam, M&V Industries ki taraf badh gaye.

Dopahar ka sooraj, aasman mein chamakane laga tha. Dharna abhi bhi chal raha tha. Par, Mittal ki aankhein aur nahi dekh saktin thin.

Mittal - Hello, Police Station......

Vishwa ke kadam Industry ke Gate paar kar ke, Ashok ke saamne aa ruke.

Vishwa - Tera baap toh mar gaya...Saale, ab hume bhookhe maarega kya?

Vishwa ka haath ghuma aur Ashok ka munh surkh laal ho gaya.

Ashok - Main, paise ikktha kar ke tumhe de dunga.

Vishwa - Tere paas do Kidney hain.......Ek Bech de.

Ashok - Yeh, mere hak ki ladai hai. Par, main kutta nahi hun joh doosre kutton se apni roti ke liye cheena - jhappati kare. Hum, yahan tab tak baithe rehenge jab tak hume humara hak nahi mil jaata.

Vishwa - Toh, apne aap ko goli maar le beta. Kyunki, tera hak kab ka Minister dwara sign kar diya gaya hai...Tujhe, kya laga?...Sarkari zameen par, Illegal tareeke se Auditorium bana lega..Do din hain..

Ashok ki aankhon mein paani bhar aaya. Is se pehle uske dost usse, sambhalte Siren ki awaz se mauhal garam ho gaya. Police ke sipahi laathi charge karne lage. Logon, mein afra - tafri mach gayi.

Uday - Ashok, uth.

Ashok abhi bhi wahin baitha raha. Abhimanyu aur Uday kisi tarah usse utha kar laane mein kamyab huye.

Uday - Paisa...Corruption..Corrupt log apne Desh ke saath - saath khud ko toh bech hi chuke hain. Ab, toh Sarkar ko Casinos mein logon ko ek dusre ka cheer haran bhi karne dena chahiye. Apne, bacchon ko maar kar un par se School ka bojh khatam karna chahiye..

Abhimanyu - Shaant Reh... Dekh, Ashok tu apni Performance par dhyaan de. Yeh shayad tera aakhiri Show hai. Yeh, Show hum khaas Charity ke liye kar rahe hain. Apni, nahi toh un Jhuggi waalon ki toh kuch madad kar paayein.

Ashok - Yeh le...Auditorium ka kagaaz. Shayad, yeh mere se zada tere haath mein rehne ka hakdar hai. Darwaza toh band ho hi chuka hai. Ab, koi chabbi nahi chalegi.

Abhimanyu kuch bola nahi. Bas, usne apne dost ko gale se laga liya. Parda uth gaya. Aur, Ashok, Nirav mein badal gaya.

'Nirav Shah...Zindabad'

Nirav - Yeh desh kahan tha. Ab kahan ho gaya hai. Aaj ka Youth badal gaya hai. Aaj, Change ki zarurat hai. Main koi krantikari nahi hun. Par, apne jaise College ke liye meri hi zarurat hai. Main, vaada karta hun sabko sabka sampooran adhikaar milega. Ragging ki jad hi ukhad di jaayegi. Eve Teasing ko band kiya jaayega. Inn sab mein mujhe aap sab ki zarurat hai. Aur, aapko meri. Vote, mujhe hi dein.

Youth ki bheed mein naare aur zor lene lage.

Peter ke pair daudte huye, Nirav tak pahunche. Aur, Nirav ke kadam wahan se seedha, Hostel ke 400 kamre mein pahunch gaya. Kamra, Ransa ka tha.

Ransa - Aayie, Neta Sahab! Kya lenge? Whisky, ya Desi hi peeyenge.

Nirav - Kaam ki baat bhaunk.

Ransa - Toh, Neta Ji aaj ki taza khabar yeh hai ki aap Election se withdraw kar rahe hain. Youth ko garam khoon chahiye.

Nirav - Khoon hai? Toh bahao. Par, tum kyun bahaoge? Baap, M.P. hai. Paise de kar Election jeetoge. Tere, Election jeetne par kuch nahi hoga. Cheating badhegi. Eve Teaser, Canteen mein chai ki chusiyan lagayenge. Tu khud ek problem hai..Apne, Corrupt baap ki tarah.

Ransa - Mere, paas Maa hai.

Ransa ne jeb se bandook nikal, Nirav par taan di. Ek dhamaka huya. Aur, Nirav ka shareer shaant sa zameen par gir gaya.


Nirav ka Role kar rahe Ashok ka shareer sunn sa zameen par pada raha. Darshakon mein taaliyon ki awaz aur gehri hoti chali gayi. Ransa ka role, Play kar rahe Actor ke chehre par hawayein udne lagin...Ashok, ki Shirt se beh kar, Stage laal ho rahi thi...Abhimanyu, bhaga huya Stage par aaya...Ashok ke paas padi goli ko dekh kar woh sab mazra samajh gaya.

Abhimanyu - He is Dead........Tu, ghabra mat tujhe kuch nahi hoga. Tune, isse nahi maara.

'Ram Naam Sat Hai' ke naare sadak par gunz rahe the. Ashok ki laash lete huye, uske dost shamshaan ki taraf jaa rahe the. Abhimanyu ki aankhon mein sab se zada ansu the. Apne, Dost saman Bhai ki arthi woh kandhon par utha ke le jaa raha tha.

'Rukiye, aap aage nahi jaa sakte.'

Abhimanyu - Jee, hum shamshaan jaa rahe hain.

'Wapis, mud jaayie Sahib! Mr. Mittal ki Car yahan se guzarne hi waali hai..Aaj, woh apni Company ki Franchise launch karne jaa rahe hain.'

Uday - Ab?

Ashok ki laash ko waapis, auditorium ki stage par laa kar rakh diya gaya.

Abhimanyu - Aaj, aakhiri show dekh lo.

Abhimanyu, Seat par jaa kar baith gaya. Itne, mein jhuggi waale, Ashok ki laash par aa kar phool barsane lage.

Abhimanyu - Woh, mar chuka hai.

'Humare, liye toh Devta hai Sahab. Hum logon ko naye ghar diye jaa rahe hain. Sab, aap logon ke chande ki wajah se.'

Abhimanyu - Meri, nahi...Sirf, uski wajah se...Ab, tum log jaayo, Bulldozer kisi bhi pal yahan aa sakta hai..

Uday - Main, bhi rukta hun.

Abhimanyu - Tu, nikal...Main kuch der yahan akela baithna chahta hun.

Uday aur Jhuggi waale chale gaye.

Abhimanyu, Stage ki taraf aaya aur Ashok ki laash ko gale laga rone lage.

Abhimanyu - Maaf, karna Dost...Khoon se range inn haathon se antim sanskar kar raha hun. Apne, haathon se tere sapnon ka gala ghont diya.

Abhimanyu ne, Lighter nikala aur Stage par aag laga di. Aankhon mein ansu liye woh darwaze ki taraf chal pada. Jalti chita ke saath, Ashok ke armaan bhi dhuaan ban kar ud rahe the. Bulldozer ki awaz paas aa chuki thi.

Thursday, August 12, 2010

Demon In A Bottle

"सॉरी, आपकी दूसरी किडनी भी फ़ेल हो गयी है. क्या, अब आप हॉस्पिटल में भर्ती होना चाहेंगे?"

"पहले, ठेके पर जाना चाहूँगा!"

हॉस्पिटल के कॉरिडोर में चलते, राहुल के चेहरे पर एक मुस्कान उभर रही थी. डॉक्टर, की बात आज तक किसने सुनी है? आज, उसे एक ही पैग चढाने का मौका मिला था! अपने, दिल की धीमी पड़ती धड्कन उसके कान सुन पा रहे थे. क्या, पता अभी वहीँ गिर पड़े? किसी तरह, राहुल कार तक पहुंचा.

कार, की डिकी में बकार्डी का एक पूरा पैक था! शराब पि कर गाड़ी चलाना हानिकारक है.

राहुल की नज़रें सड़क पर कम, और बोत्तल की तरफ जादा थीं! स्ट्रीट लाइट के निचे से गुज़र रही गाड़ी, कठपुतली की तरह चल रही थी. राहुल, अपनी यादों में खो चूका था! उसे, अभी भी याद थी वो मनहूस रात, जिस दिन उसने अपनी बीवी और दो बच्चों को एक्सीडेंट में खोया था! याद, थीं वो चीखें जो अब भी उसके दिमाग में घूम रहीं थीं! अपने, परिवार के खून से सने चेहरे...शराब पि कर गाड़ी चला रहे, राहुल को तो कुछ नहीं हुआ पर एक बोत्तल ने उसकी पूरी ज़िन्दगी उजाड़ दी.

पर, अब राहुल की दूसरी शादी हो चुकी थी! और, उसका एक बेटा भी था. अपनी, यादों में खोये राहुल को यह भी नहीं पता था, की आज उसके साथ वाला शैतान फिर से भूखा था! गाड़ी, खंभे से जा टकराई. पेट्रोल, के साथ ही कुछ और भी बह रहा था. खून!

रुको...गाड़ी का दरवाज़ा खुला, खून से रँगे जूते का निशान तारकोल पर पड़ा. अभी, राहुल जिंदा था. पूरा सूट खून से ज़रूर रंग चूका था, फिर भी चेहरे पर मुस्कान थी. राहुल, ने डिक्की खोली, और पागलों की तरह शराब की बोत्त्लें सड़क पर फेंकने लगा. यह, हर इंसान करता है. जगह कोई भी हो, वक़्त कोई भी हो, रंग कोई भी हो...खून सबका एक है...और, यह सड़क पर टूटतीं बोत्त्लें, राहुल की चीखें हैं. हर, किसी की अलग होती हैं.

एक, बोत्तल बची गयी! राहुल, का घर बस १५ मिनट दूर था! उसकी, आँखें अब नम नहीं थीं. शायद, आखिरी बोत्तल बचने की वजह से.

अपने, घर के सामने खड़े राहुल ने वोह बोत्तल ख़तम की और अन्दर घुस गया. उसकी नज़र किसी को ढूंढ रही थी. पर, यह क्या? यह तो उसकी पहली बीवी है! उसे, उसका पीछा करने का इशारा कर रही है!

"तुम जिंदा हो?"

राहुल के कदम उसकी नयी बीवी के कमरे में पड़े. रसोई से उठाया हुआ चाकू, उसके हाथ में चमक रहा था! एक, पल बाद उसकी बीवी का सर उसके हाथ में था. पूरा बिस्तर खून से नहा चूका था! उसके, बाद अपने बेटे को गोली मारी.

"मैं, मर चूका हूँ !"

चाकू, राहुल के सिने में से जगह बनता हुआ उसके दिल को चीर गया. पहले से ही खून सने, सूट पर नया खून लग गया!